
मुद्रास्फीति (Inflation) वह आर्थिक स्थिति है जिसमें समय के साथ वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें सामान्य रूप से बढ़ती हैं, और इस कारण मुद्रा की क्रय शक्ति (purchasing power) घटती जाती है। सरल शब्दों में, मुद्रास्फीति का अर्थ है कि पहले की तुलना में अब एक ही मात्रा में सामान खरीदने के लिए अधिक पैसे खर्च करने पड़ते हैं। वस्तुओं और सेवाओं की कीमत में होने वाली लगातार बढ़ोतरी को मुद्रास्फीति (Inflation) कहते हैं। मुद्रास्फीति ऊपर होने पर रुपये की खरीदने की ताकत कम हो जाती है यानी हर एक रुपये से कम सामान या सेवाएं खरीदी जा सकती हैं। अगर देश में और कुछ नहीं बदला है और टमाटर की कीमतें 15 रुपये से बढ़कर 20 रुपये हो गई हैं तो मुद्रास्फीति को इस की वजह माना जाता है। मुद्रास्फीति एक आम घटना है लेकिन ऊंची मुद्रास्फीति की दर को अच्छा नहीं माना जाता है। इसकी वजह से अर्थव्यवस्था में दबाव आ जाता है। सरकार हमेशा कोशिश करती है कि मुद्रास्फीति की दर एक निश्चित सीमा से ऊपर ना हो पाए। मुद्रास्फीति को नापने के लिए एक इंडेक्स का इस्तेमाल किया जाता है उस इंडेक्स में कितने प्रतिशत की बढ़ोतरी या कमी हुई है उसी के आधार पर मुद्रास्फीति को ऊपर या नीचे जाता हुआ बताया जाता है। मुद्रास्फीति वह प्रक्रिया है जिसमें वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें सामान्य रूप से बढ़ती हैं, जिससे मुद्रा की क्रय शक्ति घटती है।
मुद्रास्फीति को नापने वाले इंडेक्स 2 तरीके के होते हैं – होलसेल प्राइस इंडेक्स यानी डब्लू पी आई (WPI) और कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स यानी सी पी आई (CPI)
- उद्देश्य:
- आर्थिक संतुलन बनाए रखना: हल्की मुद्रास्फीति अर्थव्यवस्था के लिए स्वस्थ मानी जाती है क्योंकि यह मांग और आपूर्ति में संतुलन बनाए रखने में मदद करती है।
- आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना: नियंत्रित मुद्रास्फीति से उत्पादन और निवेश को प्रोत्साहन मिलता है।
- मापने के तरीके:
- उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI): यह सूचकांक एक विशिष्ट समय अवधि के दौरान उपभोक्ताओं द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में परिवर्तन को मापता है।
- थोक मूल्य सूचकांक (WPI): यह सूचकांक थोक बाजार में वस्तुओं की कीमतों में परिवर्तन को मापता है।
- ग्रोस डोमेस्टिक प्रोडक्ट डिफ्लेटर (GDP Deflator): यह सूचकांक पूरे अर्थव्यवस्था में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में परिवर्तन को मापता है।
- कारण:
- मांग खींच मुद्रास्फीति (Demand-Pull Inflation): जब मांग बढ़ती है और आपूर्ति उस मांग को पूरा नहीं कर पाती, तो कीमतें बढ़ जाती हैं।
- लागत धक्का मुद्रास्फीति (Cost-Push Inflation): जब उत्पादन की लागत (जैसे मजदूरी, कच्चे माल की कीमतें) बढ़ती हैं, तो उत्पादन की कुल कीमत बढ़ जाती है, जिससे मुद्रास्फीति होती है।
- निर्मित मुद्रास्फीति (Built-In Inflation): जब मजदूरी और कीमतें एक दूसरे को बढ़ावा देती हैं, तो यह मुद्रास्फीति की स्थिति होती है।
- प्रभाव:
- क्रय शक्ति में कमी: मुद्रास्फीति से मुद्रा की क्रय शक्ति घटती है, यानी आप पहले की तुलना में अब कम सामान खरीद सकते हैं।
- ब्याज दरों में परिवर्तन: मुद्रास्फीति की दर बढ़ने पर केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ा सकता है ताकि मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित किया जा सके।
- बचत और निवेश पर प्रभाव: उच्च मुद्रास्फीति बचत की क्रय शक्ति को कम कर देती है और निवेश के लिए भी जोखिम पैदा कर सकती है।
- मुद्रास्फीति पर नियंत्रण:
- मौद्रिक नीति: केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को समायोजित करके मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित करता है।
- राजकोषीय नीति: सरकार करों और सरकारी खर्च को नियंत्रित करके अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति को नियंत्रित कर सकती है।
- आपूर्ति बढ़ाना: उत्पादन और आपूर्ति को बढ़ाकर मांग को पूरा किया जा सकता है, जिससे मुद्रास्फीति को नियंत्रित किया जा सकता है।
उदाहरण:
मान लीजिए कि पिछले साल 100 रुपये में जो सामान खरीदा जा सकता था, इस साल उसी सामान को खरीदने के लिए 105 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। इसका मतलब है कि मुद्रास्फीति दर 5% है।
मुद्रास्फीति एक महत्वपूर्ण आर्थिक अवधारणा है जो किसी भी अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य और स्थिरता पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। इसे नियंत्रित करना आवश्यक है ताकि आर्थिक विकास को स्थिर रखा जा सके और आम लोगों की क्रय शक्ति सुरक्षित रहे। मुद्रास्फीति के सही प्रबंधन के लिए मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों का उपयोग आवश्यक है, ताकि अर्थव्यवस्था संतुलित और स्वस्थ रह सके।
